✍🏻 लेखक: अधिवक्ता अभिषेक जाट
भारत में आपराधिक न्याय व्यवस्था केवल सजा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सुधार और पुनर्वास की प्रक्रिया भी शामिल है। हाल ही में केरल हाईकोर्ट द्वारा दिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया गया कि कैदी भी समाज का हिस्सा हैं, और उन्हें भी अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारियों को निभाने का अवसर मिलना चाहिए।
📌 केस पृष्ठभूमि:
केरल हाईकोर्ट ने Shafeena P.H. बनाम State of Kerala में एक पिता को अपने बच्चे के उच्च शिक्षा में दाखिले हेतु अस्थायी पैरोले प्रदान की। न्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हिकृष्णन ने यह माना कि एक पिता की उपस्थिति शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षणों में अत्यंत आवश्यक है।
⚖️ पैरोले क्या है?
पैरोले एक ऐसी कानूनी प्रक्रिया है जिसमें अच्छे आचरण के आधार पर कैदी को अस्थायी रूप से जेल से रिहा किया जाता है, ताकि वह सामाजिक व पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभा सके। यह रिहाई सजा को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे स्थगित करती है।
प्रकार:
1. नियमित पैरोले: गंभीर बीमारी, पारिवारिक सदस्य की मृत्यु, शादी या विशेष Leave Petition दाखिल करने जैसे कारणों पर दी जाती है।
2. कस्टडी पैरोले: आकस्मिक परिस्थितियों में दी जाती है जिसमें पुलिस की निगरानी बनी रहती है।
3. फरलो (Furlough): अच्छा आचरण होने पर थोड़े समय के लिए छुट्टी दी जाती है, यह सजा का हिस्सा मानी जाती है।
⚖️ न्यायिक दृष्टिकोण:
🔹 Sunil Batra बनाम दिल्ली प्रशासन और Mohammed Giasuddin बनाम आंध्र प्रदेश राज्य जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने कैदियों के अधिकारों को रेखांकित किया है।
🔹 Asfaq बनाम राजस्थान राज्य के केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि गंभीर अपराध अपने आप में पैरोले से वंचित करने का कारण नहीं बन सकता, जब तक कि व्यक्ति समाज के लिए खतरा न हो।
🔹 Maru Ram बनाम भारत संघ में यह दोहराया गया कि पैरोले को उदारता से दिया जाना चाहिए ताकि सुधार की प्रक्रिया में मदद मिल सके।
🌐 अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य:
संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकाशित Standard Minimum Rules for the Treatment of Prisoners (1958) इस बात पर बल देते हैं कि जेलों को समाज से अलग थलग स्थान नहीं बनाना चाहिए, बल्कि सुधारात्मक संस्थान होना चाहिए।
⚠️ अगर पैरोले न दिया जाए तो?
👉 लंबे समय तक जेल में रहने वाले कैदी समाज से कट जाते हैं, जिसे institutionalization कहा जाता है। इससे उनके पुनर्वास में कठिनाई आती है और वे रिहाई के बाद फिर अपराध की ओर लौट सकते हैं।
👉 सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि एक न्यायसंगत समाज वही होता है जो अपने सबसे कमजोर वर्ग—कैदियों—को भी मानवीय गरिमा प्रदान करे।
📜 संवैधानिक समर्थन:
▶️ अनुच्छेद 14 – मनमानेपन के विरुद्ध सुरक्षा
▶️ अनुच्छेद 19 – युक्तियुक्त प्रतिबंध
▶️ अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
Maneka Gandhi, Sunil Batra (II), और Charles Sobraj के मामलों में इन अधिकारों को स्पष्ट रूप से व्याख्यायित किया गया।
🔚 निष्कर्ष:
पैरोले केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह न्याय की संवेदनशीलता और समाज की मानवीय दृष्टिकोण की परख भी है। कैदियों को सुधार का अवसर देना, उन्हें पुनः समाज से जोड़ना, और उनके साथ गरिमा के साथ व्यवहार करना ही एक प्रगतिशील लोकतंत्र की पहचान है।
“न्याय का मतलब केवल सजा नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास भी है।”
📌 लेखक परिचय:
अधिवक्ता अभिषेक जाट,
📍हाईकोर्ट बेंच ग्वालियर,
📞 9752547352
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