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Tuesday, 17 June 2025

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न: शिकायत कैसे दर्ज करें (POSH अधिनियम के तहत)

June 17, 2025 0

 


कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न: शिकायत कैसे दर्ज करें (POSH अधिनियम के तहत)

लेखक: एडवोकेट अभिषेक जाट

कार्यस्थल पर महिलाओं को यौन उत्पीड़न से बचाना एक मूलभूत अधिकार है। भारत में, इस अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (POSH अधिनियम) एक सशक्त कानूनी ढाँचा प्रदान करता है। यह अधिनियम हर महिला को एक सुरक्षित और सम्मानजनक कामकाजी माहौल का भरोसा देता है। इस विस्तृत लेख में, हम POSH अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया को गहराई से समझेंगे, जिसमें इसके महत्वपूर्ण पहलुओं और संबंधित समितियों की भूमिका भी शामिल है।


POSH अधिनियम और इसका महत्व

POSH अधिनियम का प्राथमिक लक्ष्य कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न को रोकना, उसे प्रतिबंधित करना और यदि ऐसा होता है तो उसके निवारण के लिए एक प्रभावी और सुलभ तंत्र स्थापित करना है। यह कानून केवल बड़े कॉर्पोरेट या सरकारी कार्यालयों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा बहुत व्यापक है। इसमें छोटे व्यवसाय, गैर-सरकारी संगठन, अस्पताल, शिक्षण संस्थान, अनौपचारिक क्षेत्र और यहाँ तक कि घरेलू सहायक भी शामिल हैं।

यह अधिनियम स्पष्ट रूप से यह निर्देश देता है कि जिस भी संगठन में 10 या अधिक कर्मचारी हैं, उसे अनिवार्य रूप से एक आंतरिक समिति (Internal Committee - IC) का गठन करना होगा। यह समिति ही कार्यस्थल पर प्राप्त यौन उत्पीड़न की शिकायतों का समाधान करती है। वहीं, जिन संगठनों में 10 से कम कर्मचारी हैं, या यदि शिकायत स्वयं नियोक्ता के खिलाफ है, तो जिला स्तर पर गठित स्थानीय समिति (Local Committee - LC) इस मामले को देखती है। मध्य प्रदेश के गुना जिले जैसे स्थानों पर, संबंधित जिलाधिकारी के तहत स्थानीय समिति कार्य करती है ताकि छोटे प्रतिष्ठानों में भी न्याय सुनिश्चित किया जा सके।


यौन उत्पीड़न क्या है? इसकी व्यापक परिभाषा

POSH अधिनियम के तहत यौन उत्पीड़न की परिभाषा काफी व्यापक है और यह केवल स्पष्ट यौन कृत्यों तक सीमित नहीं है। इसमें कई प्रकार के अवांछित व्यवहार शामिल हैं, चाहे वे प्रत्यक्ष हों या अप्रत्यक्ष, जो यौन प्रकृति के हों और कार्यस्थल पर एक महिला के लिए शत्रुतापूर्ण वातावरण बनाते हों। इन अवांछित व्यवहारों में शामिल हैं:

  • शारीरिक संपर्क और आगे बढ़ना: इसमें अनुचित स्पर्श, गले लगाना, शारीरिक निकटता की मांग करना या किसी भी प्रकार का अवांछित शारीरिक जुड़ाव शामिल है।
  • यौन संबंध बनाने की मांग या अनुरोध: सीधे या परोक्ष रूप से यौन संबंध बनाने या यौन एहसान की मांग करना।
  • यौन संबंधी टिप्पणी करना: अवांछित यौन टिप्पणी, भद्दे चुटकुले, अश्लील भाषा का प्रयोग या किसी महिला की शारीरिक बनावट पर टिप्पणी करना।
  • अश्लील सामग्री दिखाना: अश्लील चित्र, वीडियो, ग्राफिक या किसी भी प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री प्रदर्शित करना।
  • किसी भी अन्य प्रकार का अवांछित शारीरिक, मौखिक या गैर-मौखिक यौन आचरण: इसमें यौन प्रकृति के इशारे, आँखें मारना, पीछा करना (स्टॉकिंग), या यौन अर्थ वाले ध्वनि या संकेत शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त, अधिनियम कुछ परिस्थितियों को भी यौन उत्पीड़न का हिस्सा मानता है यदि वे उपरोक्त व्यवहारों के साथ घटित होती हैं या उनका परिणाम होती हैं:

  • रोजगार में तरजीही व्यवहार का निहित या स्पष्ट वादा: जैसे पदोन्नति, वेतन वृद्धि या किसी अन्य लाभ के बदले यौन एहसान की मांग करना।
  • रोजगार में हानिकारक व्यवहार की निहित या स्पष्ट धमकी: जैसे यदि मांग पूरी न होने पर पदावनति, नौकरी से निकालना या अन्य नकारात्मक परिणाम की धमकी देना।
  • वर्तमान या भविष्य की रोजगार स्थिति के बारे में धमकी: काम के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालने की चेतावनी देना।
  • महिला के काम में हस्तक्षेप करना या उसके लिए एक भयावह, आपत्तिजनक या शत्रुतापूर्ण कार्य वातावरण बनाना: जानबूझकर काम में बाधा डालना या ऐसा माहौल बनाना जिससे महिला के लिए काम करना मुश्किल हो जाए।
  • महिला के स्वास्थ्य या सुरक्षा को प्रभावित करने वाला अपमानजनक व्यवहार: ऐसा आचरण जिससे महिला का आत्म-सम्मान प्रभावित हो या उसके मानसिक/शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़े।

शिकायत कौन दर्ज कर सकता है?

अधिनियम के तहत, कोई भी "पीड़ित महिला" शिकायत दर्ज कर सकती है। इस परिभाषा में कार्यस्थल पर काम करने वाली हर महिला शामिल है, चाहे उसकी रोजगार की प्रकृति कुछ भी हो:

  • नियमित, अस्थायी, तदर्थ या दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी।
  • प्रत्यक्ष रूप से या किसी ठेकेदार के माध्यम से नियुक्त कर्मचारी।
  • प्रशिक्षु (ट्रैनी), स्वयंसेवक या इंटर्न।
  • बिना पारिश्रमिक के काम करने वाली महिलाएं।
  • यहां तक कि कार्यस्थल पर आने वाली कोई भी महिला (जैसे ग्राहक, आगंतुक)।

कुछ विशेष परिस्थितियों में, जहाँ पीड़ित महिला स्वयं शिकायत दर्ज करने में असमर्थ है (जैसे शारीरिक या मानसिक अक्षमता, या दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु), तो उसकी ओर से निम्नलिखित व्यक्ति शिकायत दर्ज कर सकते हैं:

  • उसके रिश्तेदार या दोस्त।
  • उसके सहकर्मी।
  • राष्ट्रीय महिला आयोग या राज्य महिला आयोग का कोई अधिकारी।
  • उसका कानूनी वारिस या अभिभावक।

आंतरिक समिति (IC) और स्थानीय समिति (LC) की संरचना और शक्तियाँ

शिकायत निवारण प्रक्रिया में IC और LC की भूमिका केंद्रीय है।

आंतरिक समिति (IC)

प्रत्येक संगठन जिसके पास 10 या अधिक कर्मचारी हैं, उसे एक IC का गठन करना अनिवार्य है। इसकी संरचना इस प्रकार होती है:

  • पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer): एक वरिष्ठ स्तर की महिला कर्मचारी।
  • कर्मचारियों में से दो सदस्य: ये ऐसे कर्मचारी होने चाहिए जिनके पास सामाजिक कार्यों का अनुभव हो या कानूनी ज्ञान हो, या जिन्होंने महिला अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित की हो।
  • बाहरी सदस्य: एक ऐसा व्यक्ति जो गैर-सरकारी संगठनों या संघों से संबंधित हो, जो यौन उत्पीड़न के मुद्दों या महिला अधिकारों के कारण के प्रति प्रतिबद्ध हो। यह बाहरी सदस्य निष्पक्षता सुनिश्चित करने में मदद करता है।
  • IC में कम से कम आधे सदस्य महिलाएँ होनी चाहिए, ताकि संवेदनशीलता और उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।

IC की शक्तियाँ: IC को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत सिविल कोर्ट के समान शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, विशेषकर निम्नलिखित मामलों में:

  • किसी भी व्यक्ति को समन जारी करना और उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना।
  • दस्तावेजों की खोज और उत्पादन की आवश्यकता।
  • कोई अन्य मामला जो निर्धारित किया जा सकता है।

स्थानीय समिति (LC)

उन संगठनों के लिए जहाँ 10 से कम कर्मचारी हैं, या जहाँ शिकायत स्वयं नियोक्ता के खिलाफ है, जिला अधिकारी (District Officer) द्वारा प्रत्येक जिले में एक LC का गठन किया जाता है। मध्य प्रदेश के गुना जिले में, कलेक्टर या उनके द्वारा अधिकृत कोई भी अधिकारी इस समिति का गठन और पर्यवेक्षण करते हैं।

LC की संरचना:

  • अध्यक्ष: महिला एवं बाल विकास के क्षेत्र में काम करने वाली प्रमुख महिला।
  • एक सदस्य: जो महिला एवं बाल विकास के क्षेत्र में काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन से हो।
  • एक सदस्य: जो कानून के क्षेत्र से हो या कानून का ज्ञान रखता हो।
  • एक सदस्य: संबंधित जिले के ग्रामीण या शहरी स्थानीय निकाय से हो।
  • IC की तरह, LC में भी कम से कम आधे सदस्य महिलाएँ होनी चाहिए।

LC की शक्तियाँ: LC को भी IC के समान सिविल कोर्ट की शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, जिससे वे शिकायत की प्रभावी ढंग से जांच कर सकें।


शिकायत दर्ज करने की चरण-दर-चरण प्रक्रिया

शिकायत दर्ज करना एक संवेदनशील लेकिन आवश्यक कदम है। इसे सही ढंग से करने के लिए इन चरणों का पालन करें:

  1. शिकायत का मसौदा तैयार करना (लिखित रूप में):

    • आपकी शिकायत लिखित रूप में होनी चाहिए। यह स्पष्टता और रिकॉर्ड रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
    • आवश्यक विवरण: शिकायतकर्ता का पूरा नाम, प्रतिवादी का नाम (जिसके खिलाफ शिकायत है), घटना(ओं) की सटीक तारीख, समय और स्थान का उल्लेख करें। यदि घटनाएँ एक से अधिक हैं, तो प्रत्येक का विवरण दें।
    • घटना का विस्तृत विवरण: घटना(ओं) का क्रमवार और तथ्यात्मक विवरण दें। क्या हुआ, किसने क्या कहा या किया, और किन परिस्थितियों में हुआ - इन सभी को स्पष्ट रूप से लिखें। अनावश्यक भावनात्मक भाषा से बचें, लेकिन घटना की गंभीरता को व्यक्त करें।
    • सबूतों का उल्लेख: यदि आपके पास कोई सहायक सबूत हैं (जैसे ईमेल, टेक्स्ट संदेश, चैट लॉग, तस्वीरें, वीडियो, सीसीटीवी फुटेज), तो उनका उल्लेख करें। यदि कोई गवाह है, तो उनके नाम और संपर्क विवरण (यदि उपलब्ध हो) दें। हालांकि, यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि शिकायत दर्ज करने के लिए सबूत अनिवार्य नहीं है; जांच प्रक्रिया के दौरान उन्हें एकत्र किया जा सकता है।
  2. सही प्राधिकारी की पहचान और शिकायत जमा करना:

    • आंतरिक समिति (IC): यदि आपके संगठन में 10 या अधिक कर्मचारी हैं, तो अपनी लिखित शिकायत सीधे अपनी कंपनी की आंतरिक समिति को जमा करें।
    • स्थानीय समिति (LC): यदि आपके संगठन में 10 से कम कर्मचारी हैं, या यदि आपकी शिकायत स्वयं नियोक्ता के खिलाफ है, तो आपको अपने जिले की स्थानीय समिति से संपर्क करना होगा। गुना जिले में, आप कलेक्टर कार्यालय में या संबंधित महिला एवं बाल विकास विभाग के माध्यम से LC का पता लगा सकते हैं।
    • SHe-Box (ऑनलाइन पोर्टल): भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा एक ऑनलाइन शिकायत प्रबंधन प्रणाली SHe-Box शुरू की गई है। यह केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के लिए है, लेकिन यदि आपके पास IC/LC की पहुँच नहीं है, या आप शिकायत को सीधे संबंधित प्राधिकारी तक पहुँचाना चाहते हैं, तो आप इस ऑनलाइन पोर्टल का उपयोग कर सकते हैं।
    • समय सीमा: शिकायत घटना की तारीख (या यदि यह घटनाओं की एक श्रृंखला है तो अंतिम घटना की तारीख) से तीन महीने के भीतर IC/LC को जमा की जानी चाहिए। यदि IC/LC देरी के कारणों से संतुष्ट है, तो इस अवधि को अतिरिक्त तीन महीने तक बढ़ाया जा सकता है।
    • जमा करने का तरीका: शिकायत ईमेल के माध्यम से या हार्ड कॉपी के रूप में जमा की जा सकती है। हमेशा जमा करने का प्रमाण (जैसे ईमेल की रसीद या हस्ताक्षरित पावती) अवश्य लें।

शिकायत दर्ज होने के बाद की प्रक्रिया: जांच का गहन विश्लेषण

शिकायत प्राप्त होने के बाद, IC/LC एक व्यवस्थित और निष्पक्ष जांच प्रक्रिया का पालन करती है, जो "प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों" (Principles of Natural Justice) पर आधारित होती है। इसका अर्थ है कि दोनों पक्षों को सुने जाने और अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए।

  1. शिकायत की स्वीकृति और प्रारंभिक सहायता:

    • IC/LC शिकायत प्राप्त होने की पुष्टि करती है और शिकायतकर्ता को सूचित करती है।
    • यदि शिकायतकर्ता को शिकायत का मसौदा तैयार करने में सहायता की आवश्यकता है, तो IC/LC उसे उचित सहायता प्रदान करेगी।
  2. समझौता (वैकल्पिक, लेकिन मौद्रिक नहीं):

    • शिकायतकर्ता के अनुरोध पर, IC/LC मामले को सुलझाने के लिए समझौते की प्रक्रिया शुरू कर सकती है।
    • यह स्पष्ट रूप से ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का मौद्रिक समझौता शामिल नहीं हो सकता। समझौते का उद्देश्य केवल कार्यस्थल पर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व सुनिश्चित करना हो सकता है, जैसे कार्यस्थल का बदलाव।
  3. औपचारिक जांच का प्रारंभ:

    • यदि समझौता नहीं चुना जाता है या असफल रहता है, तो IC/LC औपचारिक जांच के साथ आगे बढ़ती है।
    • प्रतिवादी को नोटिस: सबसे पहले, प्रतिवादी (जिसके खिलाफ शिकायत है) को शिकायत की एक प्रति के साथ एक नोटिस भेजा जाता है। उसे 10 दिनों के भीतर अपना लिखित जवाब प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता है।
    • दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर: IC/LC दोनों पक्षों को (शिकायतकर्ता और प्रतिवादी) अपने पक्ष, गवाहों को प्रस्तुत करने और अपने सबूत पेश करने का निष्पक्ष अवसर प्रदान करती है। क्रॉस-एग्जामिनेशन (एक-दूसरे से सवाल पूछना) की अनुमति हो सकती है, लेकिन यह IC/LC की निगरानी में और उत्पीड़न से बचाव के लिए होता है।
    • साक्ष्य का संग्रह: IC/LC स्वयं भी प्रासंगिक सबूतों को इकट्ठा कर सकती है, जैसे दस्तावेजों की मांग करना या संबंधित व्यक्तियों से पूछताछ करना।
    • समय सीमा: जांच प्रक्रिया को 90 दिनों के भीतर पूरा किया जाना अनिवार्य है।
  4. अंतरिम उपाय (जांच के दौरान): जांच लंबित रहने के दौरान, IC/LC शिकायतकर्ता के अनुरोध पर कुछ अंतरिम उपायों की सिफारिश कर सकती है ताकि कार्यस्थल पर उसकी सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित हो सके। इनमें शामिल हैं:

    • शिकायतकर्ता या प्रतिवादी का दूसरे कार्यस्थल पर स्थानांतरण
    • शिकायतकर्ता को छुट्टी देना (जिसके लिए वह अन्यथा हकदार नहीं होती)।
    • प्रतिवादी को शिकायतकर्ता के काम पर किसी भी प्रकार की रिपोर्टिंग या प्रदर्शन मूल्यांकन करने से रोकना।
    • पीड़ित महिला को तीन महीने तक का अतिरिक्त अवकाश प्रदान करना, यदि वह यौन उत्पीड़न के कारण भावनात्मक या मानसिक आघात से गुजर रही है।
  5. गोपनीयता का रखरखाव: अधिनियम शिकायतकर्ता, प्रतिवादी, गवाहों की पहचान और जांच की कार्यवाही से संबंधित सभी जानकारी की सख्त गोपनीयता बनाए रखने का प्रावधान करता है। किसी भी जानकारी का खुलासा अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत करने पर दंड का प्रावधान है।


जांच का परिणाम और अनुशंसित दंड

जांच रिपोर्ट:

  • जांच पूरी होने के 10 दिनों के भीतर, IC/LC अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट नियोक्ता को प्रस्तुत करती है।
  • यदि आरोप सिद्ध होते हैं: IC/LC प्रतिवादी के खिलाफ कठोर कार्रवाई की सिफारिश करती है। इसमें शामिल हो सकता है:
    • संगठन की सेवा नियमों के अनुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई (जैसे चेतावनी, सेंसर, वेतन वृद्धि रोकना, पदोन्नति से वंचित करना, नौकरी से बर्खास्त करना)।
    • पीड़ित महिला को हुए नुकसान के लिए क्षतिपूर्ति का भुगतान (जो वेतन से कटौती के रूप में हो सकता है)।
    • परामर्श या संवेदीकरण कार्यक्रमों में भाग लेना।
  • यदि आरोप सिद्ध नहीं होते हैं या दुर्भावनापूर्ण पाए जाते हैं: यदि IC/LC यह पाती है कि शिकायत झूठी है या दुर्भावनापूर्ण इरादे से की गई है, तो वह शिकायतकर्ता के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश कर सकती है (लेकिन केवल तभी जब दुर्भावनापूर्ण इरादा स्पष्ट रूप से साबित हो)। हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि केवल आरोप साबित न होने पर शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती।

विशाखा निर्णय (1997): POSH अधिनियम की नींव

POSH अधिनियम 2013 में लागू होने से पहले, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से निपटने के लिए कोई विशिष्ट कानून नहीं था। इस शून्य को भरने के लिए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने विशाखा और अन्य बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (1997) के ऐतिहासिक मामले में "विशाखा दिशानिर्देश" जारी किए।

यह निर्णय एक जनहित याचिका (PIL) के परिणामस्वरूप आया था, जिसे महिला अधिकार समूहों ने राजस्थान की एक सामाजिक कार्यकर्ता भंवरी देवी के सामूहिक बलात्कार के बाद दायर किया था, जब वह एक बाल विवाह को रोकने का प्रयास कर रही थीं।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया कि यौन उत्पीड़न संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 19(1)(g) (कोई भी पेशा अपनाने का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत एक महिला के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। न्यायालय ने नियोक्ताओं को कुछ अनिवार्य कदम उठाने के लिए निर्देशित किया, जिनमें शामिल थे:

  • कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए एक विस्तृत नीति बनाना।
  • शिकायतों को संभालने के लिए एक आंतरिक शिकायत समिति का गठन करना।
  • कार्यस्थल पर जागरूकता बढ़ाना और निवारक उपाय करना।

ये दिशानिर्देश, 2013 में POSH अधिनियम के अधिनियमन तक, भारत में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को संबोधित करने के लिए कानूनी ढाँचा बने रहे। POSH अधिनियम इन्हीं दिशानिर्देशों पर आधारित है और उन्हें एक पूर्ण कानून का रूप देता है।


याद रखें और कार्रवाई करें

  • आपका अधिकार है: प्रत्येक महिला को एक सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल पर काम करने का पूर्ण अधिकार है।
  • शून्य सहिष्णुता: सभी संगठनों को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति अपनानी चाहिए और उसे सख्ती से लागू करना चाहिए।
  • समर्थन मांगें: यदि आप या आपके परिचित किसी को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है, तो अपनी IC/LC, या राष्ट्रीय महिला आयोग, राज्य महिला आयोग, या यहां तक कि पुलिस जैसे बाहरी निकायों से संपर्क करने में संकोच न करें।

ज्ञान शक्ति है, और कार्रवाई से बदलाव आता है। अपने अधिकारों को जानें और एक सुरक्षित कार्यस्थल के लिए आवाज़ उठाएं।

अधिक जानकारी और सहायता के लिए संपर्क करें: एडवोकेट अभिषेक जाट

अस्वीकरण:
यह लेख केवल सूचनात्मक और अकादमिक उद्देश्यों के लिए है। इसे कानूनी सलाह नहीं माना जाना चाहिए और न ही इसके माध्यम से वकील-मुवक्किल का संबंध स्थापित होता है। पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे विशिष्ट कानूनी मुद्दों या मामलों के संबंध में किसी योग्य कानूनी पेशेवर से सलाह लें। इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और किसी भी संगठन या संस्था की आधिकारिक स्थिति का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।
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